उधमसिंहनगर: डॉक्टर सुशीला तिवारी B.Ed कॉलेज सितारगंज में स्वामी विवेकानंद जी की जयंती मनाई गई

2018-01-12 07:28:04.0

उधमसिंहनगर: डॉक्टर सुशीला तिवारी B.Ed कॉलेज सितारगंज में स्वामी विवेकानंद जी की जयंती मनाई गई

Covered By :अंजुम कादरी, Edited By :रितिका सिंह

प्रेरणा के स्रोत स्वामी विवेकानंद जी की कही एक एक बात हमें आज भी ऊर्जा प्रदान करती है

उधमसिंहनगर: स्वामी विवेकानंद की 154 वी जयंती के उपलक्ष पर प्रिंसिपल डॉक्टर हरि ओम अवस्थी ने मौजूद सभी लोगों को बताया कि स्वामी विवेकानंद 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे और 4 जुलाई 1902 को उनकी मृत्यु बेलूर में हुई स्वामीजी एक युवा सन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगंध विदेशों में बिखेरने वाले साहित्य दर्शन और इतिहास के प्रकांड विद्वान थे विवेकानंद का मूल्य नाम नरेंद्रनाथ दत्त था जो कि आगे चलकर स्वामी विवेकानंद नाम से विख्यात हुआ

युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु जिन्होंने हिंदू धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की अहमियत संस्कृति से जोड़ने का आग्रह किया वही डॉक्टर पीके पंत ने स्वामी जी की जीवनी कुछ इस तरह बयान की कोलकाता के एक कुलीन परिवार में जन्मे नरेंद्र नाथ विवेकानंद व तार्किक का भौतिक एवं बौद्धिक शिक्षा के साथ-साथ संगीत की प्रतिभा का एक विलक्षण सहयोग थे डा.पंत ने बताया भारत में स्वामी जी की जयंती को राष्ट्रीय दिवस के रुप में भी मनाया जाता है इसी के चलते डॉक्टर हेमा कथूरिया ने भी स्वामी जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए मौजूद लोगों को बताया स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 में कोलकाता वर्तमान कोलकाता भारत में हुआ रोमा रोला ने नरेंद्र दत्त भावी विवेकानंद के संबंध में ठीक कहा उनका बचपन और युवावस्था के बीच युवा के किसी कलाकार राजपत्र के जीवन प्रभात का स्मरण दिलाता है बचपन से ही विवेकानंद ने आध्यात्मि पी पी साकी सन 1884 के पिता की मृत्यु के बाद परिवार की देखरेख का भार भी स्वामी विवेकानंद जी पर पढ़ा वहीं अंजुम कादरी जी ने मौजूद छात्रों को बताया स्वामी जी गरीब परिवार से थे स्वामी जी का विवाह नहीं हुआ था दुर्बलता की स्थिति में स्वयं भूखे रहकर अतिथियों के सत्कार की गौरव गाथा उनके जीवन का उज्जवल अध्याय है विवेकानंद जी की प्रतिभा अपूर्व कि उन्होंने बचपन में ही दर्शनों का अध्ययन कर लिया उनकी जिज्ञासा शांत ना हुई इसी साधना में समाधान ना पाकर नास्तिक हो चले उन्हें दमा और शकरा के अतिरिक्त अंय शारीरिक बीमारियों ने घेर रखा था स्वामी जी ने कई बार यह भी कहा था यह बीमारियां मुझे 40 वर्ष की आयु भी पार नहीं करने देगी4 जुलाई 1902 को बेनूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानात्मक अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए उनके चाहने वालों ने उनकी स्मृति में एक बहुत ही शानदार मंदिर बनाया और आज भी 130 केंद्रों पर स्वामी विवेकानंदजी के गुरु रामकृष्ण के सदस्यों के प्रचार होते हैं ।डॉ हरिओम अवस्थी ,डॉक्टर PK पंत ,डॉक्टर हेमा कथूरिया, अंजुम कादरी डॉ श्वेता तिवारी ,डॉ डी एन मोर्य , रवीश उपाध्याय ,बिनीता विस्ट ,राकेश कुमार ,प्रमोद कुमार, श्री विजय सिंह ,अजय सिंह, श्री राम ,डॉ ए पी सिंह, चरणजीत सिंह , आदि मौजूद थे




रिपोर्ट

अंजुम कादरी

प्रदेश प्रभारी उत्तराखंड



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