सुप्रीम कोर्ट में लगी है अंतरात्मा की अदालत चार जजों के बाद अब चीफ़ जस्टिस की प्रेस कांफ्रेंस

2018-01-12 18:37:32.0

सुप्रीम कोर्ट में लगी है अंतरात्मा की अदालत   चार जजों के बाद अब चीफ़ जस्टिस की प्रेस कांफ्रेंस

Cover By : अंजुम कादरी, [Edit By : रितिका सिंह]
सत्य ताले में बंद हो सकता है मगर उसमें अंतरात्मा को चीर देने की शक्ति होती है। जज लोया की मौत ने आज सुप्रीम कोर्ट को एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। भाषा और शब्दों पर न जाइये। मगर जजों का इस तरह सड़क पर आना मुल्क को चेतावनी दे रहा है। मेडिकल कालेज और जज लोया की सुनवाई के मामले में गठित बेंच ने जजों को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए प्रेरित किया है या कोई और वजह है, यह उन चार जजों के जवाब पर निर्भर करेगा। कोर्ट कवर करने वाले संवाददाता बता रहे हैं कि बेंच के गठन और रोस्टर बनाने के मामले ने इन चार जजों के मन में आशंका पैदा की और उन्होंने आप मुल्क से सत्य बोल देना का साहस किया है। क्या बेंच का गठन कार्यपालिका की प्राथमिकता और पसंद के आधार पर हो रहा है?

जज लोया की मौत मुल्क की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी। आज विवेकानंद की जयंती है। अपनी अंतरात्मा को झकझोरने का इससे अच्छा दिन नहीं हो सकता। विवेकानंद सत्य को निर्भीकता से कहने के हिमायती थे। सवाल उठेंगे कि क्या सरकार ज़रूरत से ज़्यादा हस्तक्षेप कर रही है? क्या आम जनता जजों को सरकार के कब्जे में देखना बर्दाश्त कर पाएगी ? फिर उसे इंसाफ़ कहाँ से मिलेगा। इन सारे सवालों के जवाब का इंतज़ार कीजिए। सवाल कीजिए।

जज लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सुनवाई कर रहे थे। इस मामले में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आरोपी थे। जज की मौत होती है। उसके बाद अमित शाह बरी हो जाते हैं। कोई सबूत नहीं है दोनों में संबंध कायम करने के लिए मगर एक जज की मौत हो, उस पर सवाल न हो, पत्नी और बेटे को इतना डरा दिया जाए कि वो आज तक अपने प्यारे वतन भारत में सबके सामने आकर बोलने का साहस नहीं जुटा सके। क्या यही विवेकानंद का भारत है ?

शुक्र है भारत में कैरवान जैसी पत्रिका है, निरंजन जैसा पत्रकार है, विनोद और हरतोष जैसे संपादक हैं,जिन्होंने निर्भीकता को एक नया मक़ाम दिया है। उन वकीलों को सलाम जिन्होंने जज लोया की मौत की जाँच की मांग की।

आज ही सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया के मामले में महाराष्ट्र सरकार को नोटिस भेज कर पंद्रह जनवरी तक जवाब माँगा है। सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को गंभीर मामला बताया है।बांबे हाईकोर्ट में इसकी सुनवाई होने वाली थी। दुष्यंत दवे और इंदिरा जयसिंह जैसे कुछ वकील चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट दखल न दे। कोई बात रही होगी कि सुप्रीमकोर्ट मामले को खारिज न कर दे। बताया जाता है कि इस मामले को एक बेंच विशेष को दिए जाने के विरोध में चार सीनियर जजों ने भारत के प्रधान न्यायाधीश को असहमति पत्र लिखा और प्रेस कांफ्रेंस की। पत्र में किसी ख़ास मामले का ज़िकर नहीं है। हमारे सहयोगी आशीष भार्गव ने जो पत्र है उसका हिन्दी में सार इस तरह से भेजा है-

चिट्ठी का मजमून
- चीफ जस्टिस परंपरा से बाहर हो रहे हैं जिसमें महत्वपूर्ण मामलों में सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं ।

- चीफ जस्टिस केसों के बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं ।

- वो महत्वपूर्ण मामले जो सुप्रीम कोर्ट की अखंडता को प्रभावित करते हें वो बिना किसी वाजिब कारण के उन बेंचो को देते हैं तो चीफ जस्टिस की प्रेफेरेंस की हैं।

- इसने संस्थान की छवि खराब की है
- हम ज्यादा केंसों का हवाला नहीं दे रहे है

🔥 आज के ऐतिहासिक कदम पर बेवाक सधी हुई टिप्पणी🔥
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कूरियन जोसफ का प्रेस कांफ्रेंस देश के सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान स्थिति बयां कर रही है। दीपक मिश्रा के सीजेआई बनने के बाद केसों के बंटवारें में भेदभाव बरता जा रहा है और अपने मन मुताबिक केस का निपटारा किया जा रहा है। वही भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को भी दीपक मिश्रा द्वारा दबाया जा रहा है। यह अभूतपूर्व पहल है देश के न्यायपालिका के भविष्य के लिए। इन चार जजों ने इस देश की महान न्यायपालिका को बचाने की कोशिश की है। अब यह देश के लोगों के ऊपर है कि वह इन चार जजों का मीडिया के सामने आने का मतलब समझे। इन चार जजों के देश के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के लिए पहली बार मीडिया के सामने आना ऐतिहासिक घटना है और सरकार के लिए शर्म का विषय भी। जो जरूरत से ज्यादा न्यायपालिका में दीपक मिश्रा के बहाने हस्तक्षेप कर रहे हैं।
मुझे लगता है यह मुख्य न्यायाधीश की तानाशाही के खिलाफ़ बग़ावती बिगुल है और एक सही कदम है।
4 जजों ने कहा कि 20 साल बाद हमें दोषी ना करार ना दिया जाएं कि आपने अपना काम सही नही किया। दीपक मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में तानाशाही मचा रखी है और अपनी मन मर्जी से वे फैसले ले रहे है और जनहित को परे रखकर काम करते है जोकि संविधान की मूल आत्मा और न्याय के संगत नही है।
वरिष्ठ वकील शांतिभूषण जी ने इनके शपथ ग्रहण के पूर्व ही इनके कथित कारनामों का चिठ्ठा द वायर में खोला था।
बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में एक साथ 4 विद्वान न्यायाधीशों ने आकर जिस तरह से बगावत का बिगुल फूंका है वह दर्शाता है कि देश सच मे इस समय भयानक संकट में है।
महामहिम राष्ट्रपति जी के लिए यह फैसले की घड़ी है जब वे तुरंत कार्यवाही कर देश को इस संकट से निजात दिलवाए।
पिछले छह माहों में आये फैसलों से यह स्पष्ट विदित होता है कि न्याय की स्थिति और सम्पूर्ण न्यायपालिका की स्थिति बहुत गम्भीर है और जिस तरह से अपराधियों और हिस्ट्री शीटर लोगों को बचाया जा रहा है विचारधारा और व्यक्ति विशेष के दबाव में कुछ खास वर्ग के हितों में निर्णय लिए जा रहे है वह आम आदमी और देश के नागरिकों के लिए बड़ा खतरा है

अंजुम कादरी उत्तराखण्ड प्रदेश प्रभारी

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